ढूढ़ते ही रहे हम धरा व्योम में,
मिल सका पर नहीं सूर्य में सोम में,
यत्न करके न पाये तुझे योगी जन,
सबके भीतर बसा तू सदा ऊँ में |
मन में जब भी दूरी बढती, तो उसका परिणाम कलह है,
तिरिस्कार जब भी मिलता है, उसकी कोई रही बजह है l
माना यह सबको समझोते, करना पड़ते हैं जीवन में,
इनसे जो ऊपर उठ जाता, उसकी अपनी स्वयम जगह है l
विद्वान से शोभा सभा की, बात यह सब जानते,
वृद्ध सम्मानित सभा में, बात यह सब मानते |
है कथन यह बुद्धिमानों का, नहीं जाना उचित है,
जो, आप में क्षमता, कुशलता को नहीं पहिचानते |
सफल रहे यद्देश्य पूर्ण कर्तव्य तुम्हारा,
प्रगति पन्थ पर सदा बढ़े अस्तित्व तुम्हारा l
कर्म योग से यदि मानव रिश्ता जोड़ेगा,
स्वयम प्रकाशित हो जाये, व्यकित्त्व तुम्हारा l
मन में बस जाग्रत करना है,उच्च भावना,
कठिन परिश्रम से ही मिलती है सराहना |
उसके संग संग ईश कृपा भी है आवश्यक,
सदा तपस्या से ही होती पूर्ण साधना |
परछाईं के पीछे भागो, नहीं पकड़ में आये,
उसे छोड़ कर आगे जाओ, तो वह पीछे धाये,
माया, ममता, और तृषा का यही हाल है मानो,
उसके प्रति बस मोह छोड़ दो, मन आनन्द समाये l
यश अपयश विधि हाथ, सोच जो व्यक्ति जिया करते हैं,
हानि लाभ को छोड़, व्यक्ति कर्तव्य किया करते हैं l
जीवन या फिर मरण सदा से, उसके हाथ रहा है,
सुख दुख में समभाव, वही अमरत्व पिया करते हैं l
बहता पानी स्वच्छ औरर निर्मल होता है,
आगे बढने का प्रयास प्रतिपल होता है l सागर कब किसको मिठास दे पाया जग में ठहरे पानी में अक्सर दलदल होता है |
इर्ष्या मन में जगे, समझ लो यही डाह है,
पाने की इच्छा हो मन में, यही चाह है l
प्रगति पन्थ पर बढने की जिज्ञासा मन में,
सत्य यही है, “जहाँ चाह है वही राह है”l
धर्म आचरण का पालन कर, धर्म जिये जा,
अहंकार को छोड़, छिपा यह मर्म जिए जा.
काम, क्रोध, मद, लोभ, सदा से शत्रु रहे हैं,
फल की इच्छा क्यों करता, तू कर्म किये जा.
नेह से नाता रहा मनमीत का,
है समर्पण सार ही बस प्रीत का l
गीतकारों ने सदा से यह कहा,
दर्द से रिश्ता पुराना गीत का |
सत्यं शिवं सुन्दरम की गूंजी है वाणी,
सत्यमेव जयते की हमने पढ़ी कहानी,
ऐक झूठ सौ बार कहें क्या सच हो सकता,
सच तो सच है, यही बात जानी पहिचानी l
योग्य हितेषी मित्र मिल सकें, कम होता है,
औषधि गुण कारी, मीठी हो, कम होता है
स्वार्थ सिद्धि में ही डूबे हैं, प्राणी जग के,
अपनापन कोई दिखलाये, कम होता है l
पढ़ कर,गुन कर, गुण दोषों की करें समीक्षा,
समय पड़े पर आवश्यक उत्तीर्ण परीक्षा,
लेकिन इतना धीरज रक्खें शांत भाव से,
फल पाने को करना पड़ती सदा प्रतीक्षा l
राम का आदर्श अनुकरणीय है,
कृष्ण का सानिध्य स्मरणीय है |
आप में सामर्थ है कुछ बन सको,
अनुकरण करिये तो आदरणीय है |
सदाचार संग नम्रता, क्षमा,दया का भाव,
सत्य,शील संग प्रेम है, रहता नहीं अभाव |
ज्ञान सहज पायें सभी, रहें अगर निश्चिन्त,
अंहकार बस छोड़ दें, झूठे सभी लगाव |
जग प्रकाशित है सदा आदित्य से,
हम प्रगति करते सदा सानिध्य से,
कोई माने, या न माने सत्य है,
देश जाग्रत है सदा साहित्य से l
केवल तन ही नहीं आपका मन पवित्र हो,
आत्म नियंत्रण, परोपकार उत्तम चरित्र हो,
सुख के साथी नहीं दुःख में साथ निभायें
बस जिनके आचरण श्रेष्ठ हों वही मित्र हो |
जब प्रताड़ित हो कभी संघर्ष में,
या निराशा हो खड़ी उत्कर्ष में,
हर विफलता से न विचलित हो कभी,
तो सफलता भी मिले अपकर्ष में |
काम आज का आज, नहीं तुम कल पर डालो,
यही नियम है, समझदार तुम, देखो भालो |
बोझ बनेगा काम, अगर यह कल पर डाला,
यह सलाह है नेक, इसी व्रत को तुम पालो |
सेवा भाव समर्पण ही बस, मानव की पहिचान है,
जिसको है सन्तोष हृदय में, सच में वह धनवान है l
यों तो मरते,और जन्मते,जो भी आया यहाँ धरा पर,
करता जो उपकार सदा ही, पाता वह सम्मान |
मन में अगर छिपी होती है, कभी निराशा,
जाग्रत करना होगी अपनी ज्ञान पिपासा |
एक किरण उम्मीद, हौसला रखना होगा,
बुझे पिपासा, जाय निराशा, जगती आशा |
बारम्बार प्रयास करो तो, मिले सफलता,
चिंता और निराशा छोडो, गई विफलता.
असफलता से विमुख न हो,संघर्ष करोतुम,
जब अवसर अनकूल,प्रगति पर जीवनचलता |
हों सजग हम, यही सबको बताना है,
करो मजबूत खुद को.यह दिखाना है |
हर समय उत्तम समय आता नहीं है,
समय को ही हमें उत्तम बनाना है |
“लोक हित में ही निहित, होती सदा आराधना है,
दूसरों के कष्ट में, निज कष्ट ही सदभावना है l
दीन का दुख जान कर जो भी दुखी अन्त:करण में,
भावना उपकार की बस सरल सच्ची साधना है l
सदा सफलता चरण चूमती, हार न मानो,
सम्बन्धों को जीवन में व्योपार न मानो.
चरैवेति ही जीवन का सिध्दान्त सदा से,
कठिन परिश्रम को जीवन में भार न मानो
बनो कर्मठ, यही तो सब बताते हैं,
बढ़े साहस, यही गुरुजन सिखाते हैं l
वक्त पर जिनका नहीं बहता पसीना,
मानिये वे सदा, आँसू बहाते हैं l
बुधि विवेकयुत शिक्षा ही होती संस्कृति है,
निज कर्मो की प्रति-विम्व होती आकृति है l
यों तो आवागमन सत्य है इस धरती पर ,
मरती केवल देह, अमर होती सत्कृति है l
संग नहीं जाता कोइ, चर्चा दिन दो चार,
भाई, पत्नी, सुत सभी, छूट जांयगे यार |
जाना जब निश्चित वहाँ, फिर क्यों रहो उदास,
नाते, रिश्ते तोड़ कर, पहुँचो उसके पास |