Wednesday, 14 November 2018

अच्छा देखें आप,


सब बुराई ही खोजते, अच्छा देखें आप,
उसका प्रतिफल देखिये, पड़े अनूठी छाप |
          जब बुराई हम देखते,मन में हो संताप,
           अच्छाई तो  देखिये, बड़े  बनेगें  आप |
रकम मिले यदि चेक से, करो चेक भुगतान,
नगद पाई है यदि रकम, लौटा दो धर ध्यान |    

Monday, 12 November 2018

मिले सफलता,


बारम्बार प्रयास करो  तो, मिले  सफलता,
चिंता और निराशा  छोडो, गई  विफलता.
असफलता से विमुख न हो,संघर्ष करो तुम,
जब अवसर अनकूल,प्रगति पर जीवन चलता |

Tuesday, 6 November 2018

शुभ कामना दीपावली

बना कर देह का दीपक,
जलाओ स्नेह की बाती,
मिटे मन का अँधेरा भी,
प्रकाशित हो धरा सारी |
         दिवाली रोज मन जाये,
         विनय है ईश से मेरी,
         प्रभुल्लित आप रह पायें,
         यही शुभ कामना मेरी |

Thursday, 1 November 2018


उलझा प्राणी मोह में, जीवन है संग्राम,
वही जीत पाया इसे, जो भजते हैं राम l
                  राह  कटीली  बहुत है, पग पग पर अवरोध,
                राम भजन से सुगम है,  यह मेरा अनुरोध l

Tuesday, 30 October 2018

मिले सफलता,


बारम्बार प्रयास करो  तो, मिले  सफलता,
चिंता और निराशा  छोडो, गई  विफलता.
असफलता से विमुख न हो,संघर्ष करो तुम,
जब अवसर अनकूल,प्रगति पर चलता जीवन |

Monday, 29 October 2018

लड़ सकें कैसे यहाँ अनरीत से,


तन सुखी रहता सदा जग रीत से,
मन सुखी जो हार बदले जीत में,
है लड़ाई आज भी, जग में यहाँ,
लड़ सकें कैसे यहाँ अन रीत से l

Thursday, 25 October 2018

बेबसी


मुँह जुंबा हो बन्द वे ताले मिले,
बाद मेहनत हाथ को छाले मिले.
भूख से  तरपें नहीं  बच्चे  मेरे,
आबरू बेची, तब  निवाले  मिले |

Tuesday, 23 October 2018

सदा सफलता चरण चूमती,


सदा सफलता चरण चूमती, हार न मानो,
सम्बन्धों को जीवन में व्योपार न मानो.
चरैवेति ही जीवन का सिध्दान्त सदा से,
कठिन परिश्रम को जीवन में भार न मानो |

Friday, 19 October 2018

रावण,


 रावण
ईर्ष्या,द्वेष,दम्भ धरा अगर रहेंगे,
तो फिर अहंकार का रावण यहीं रहेगा |
शोषण, अनाचार से जो लंका बसायगा,
व्यक्ति स्वयं ही अपना कोष भरेगा |
     पौराणिक आख्यान भले ही कथा सार हो,
     यदि यह दुर्गुण हैं समाज में, तो यह मानो,
     अब भी रावण जन्मेगा, हर युग में, सुन लो,
     अनन्तकाल काल तक जीवित होगा,यह भी जानो |
केवल रावण के पुतले को यहाँ जला कर,
सोचें हम, अब हर बुराई ही मिट जायेगी,
ऐसा भ्रम यदि हम पालेंगे, मिथ्या भ्रम है,
जिन्दा बना रहेगा, जनता  बस पछताएगी |


Tuesday, 16 October 2018

करो मेहनत,


तुम करो मेहनत अभी से, लक्ष्य हो परहित तुम्हारा,
देश की  हो  सहज सेवा,  धर्म  होता  है  हमारा |
एक जुट हो कर  करेंगे, फल तभी  हमको मिलेगा,
है यही उद्देश्य सबका, हो,  प्रगति  ढूढें  किनारा |

Monday, 15 October 2018

सलाह,

 यात्रा पर जब जा रहे , कुछ बन जाते ढाल,
            नाम, पता,कुछ फोन के, नम्बर रखें सँभाल

              हस्ताक्षर ही  तब  करें, पढ़े  उसे  इक बार,
              नहिं विचार इस पर किया, पछताओ हर बार |
 निर्णय लेना बाद में, हट  जाये  जब क्रोध,
निश्चित दुखदायी सदा, मानो यह अनरोध |
                    

Sunday, 14 October 2018

काम की बातें


आप प्रशंसा तो करें, जिससे हो तकरार,
बस प्रभाव तब देखिये, माने वह उपकार |
           क्षमा करें इक बार ही, किन्तु नहीं दो बार,
           दया व्यर्थ हो जायगी, क्षमा किया हर बार |

Saturday, 13 October 2018

काम के दोहे,


           घर में  यदि व्यंजन बने, रखो  पड़ोसी ध्यान,
           सुख मिलता है सौ गुना, बनती निज पहिचान |
मन में आये माँग कर, वाहन सुख का ख्याल,
ईधन  पूरा  भरा  कर,   लौटाओ   तत्काल |

Thursday, 11 October 2018

जीवनोपयोगी बातें,

सब बुराई ही खोजते,अच्छा देखें आप,
              उसका प्रतिफल देखिये, पड़े अनूठी छाप |
जब बुराई हम देखते, मन में हो संताप,
               अच्छाई  तो  देखिये,  बड़े  बनेगें  आप | 

Sunday, 7 October 2018

काम की बातें,


कुछ बातें हैं काम की, इनको करिये रोज,
उनका फल फिर देखिये, आप मनाएं मौज.
         कुछ मित्रों के जनम दिन, अगर आपको याद,
          उसे  याद उस दिन करें,  वह भी देगा दाद.        

Tuesday, 25 September 2018

लघु कथा


 लघु कथा
 आनन्दप्रकाश को महानगर में आये अभी दस ही वर्ष हुये थे, इन्हीं वर्षों में उन्होंने अपना कारोबार बढ़ा लिया और नगर में ऐक अच्छी कोठी जिसमें कई फलदार वृक्ष थे बनवा ली थी, बेटा अच्छे स्कूल में पढ़ रहा था, पत्नी कुशल गृहणी थी और स्वयं भी “सादा जीवन उच्च विचार” में विशवास रखते थे | ऐक दिन अखबार में वास्तु शास्त्र के बारे में पढ़ थे थे तो सोचा मैं भी अपने निवास के बारे में किसी वास्तु शास्त्री से मिलूँ, यही सोच कर वे कार से ऐक वास्तु ज्ञान वाले पंडित जी के यहाँ पहुँच गये, उन्हें अपना उद्देश्य बताया तो उन्होंने कहा चल कर कोठी देखता हूँ तभी कुछ बता पाऊगा |
           कार में बैठ कर थोड़ी ही दूर चले होंगे कि उन्होंने कर रोक ली, ऐक बालक दोड़ता हुआ सडक पार कर रहा था तो सोचा अवश्य कोई दूसरा लड़का भी होगा उसे भी सडक पार कर लेने दें, आगे ऐक चोराहे के पास फिर कार रोक ली, ऐक बुढ़िया वहां आ गई उसे दस ऐक नोट दे कर कार आगे बढ़ाई, आगे उसने देखा कि रिक्से पर ऐक व्यक्ति मरीज को बिठाये अस्पताल जा रहा है, तभी उसने कार रोक कर पंडित जी से कहा दस मिनट लगेंगे इस व्यक्ति को अस्पताल तक छोड़ते चलें, उसे अस्पताल भेज कर अपनी कोठी पर पहुँचे, पंडित जी के कहने पर बाहर लान में ही बैठ गये, वहीं पास में दो बालक आम के पेड़ पर बैठे आम तोड़ रहे थे, पंडित जी बोले ये बालक आम तोड़ रहे हैं भगाओ उन्हें, आनन्द बोले “पंडित जी यदि उन्हें भगाने के लिये आवाज लगाई तो उनके गिरने का डर है, आम खा लेने दो अपने आप चले जायेंगे”|
           अब आनन्द ने पंडित जी कोठी देखने के लिये कहा तो पंडित जी बोले “आनन्द तुम जैसे अच्छे विचार वाले के यहाँ कोई वास्तु दोष नहीं हो सकता, और यदि होगा भी तो अच्छे व्यवहार और श्रेष्ठ आचरण के कारण स्वयं नष्ट हो जायेगा”| चलो अब मुझे मेरे मकान पर छोड़ दो,पर आनन्द की पत्नी ने उन्हें भोजन करा कर और दक्षिणा दे कर ही उन्हें जाने दिया |    


Tuesday, 18 September 2018

करें हम जागरण


जब कभी भी यदि बिगड़ते आचरण,
स्वार्थ लिप्सा का तने यदि आवरण l                                                  तो  आज  मानव धर्म  समझाएं उसे,
दायित्व है अपना, करें हम जागरण l

Thursday, 13 September 2018

पापों का परिणाम जनता,


पापों का  परिणाम जानता, व्यक्ति मृत्यु से  है  घवड़ाता ,
 व्याकुल हो  डरता रहता है, इसीलिये  हर  क्षण पछताता.
 धर्म, कर्म, सत्संग करोगे, तो भविष्य  भी  होगा उज्ज्वल,
 यदि यह हो विश्वास हृदय में, स्वर्ग,मोक्ष ही वह नर पाता.


Friday, 7 September 2018

आपका दिल

इस सदी में, आपके चेहरे  पे  भी मुस्कान है,
पूंछता हूँ,दिल तुम्हारा क्या बना पत्थर का है ?

उपकारी ही धन्य होते हैं.


फल देतें  हैं  सदा सभी को, वृक्ष नहीं कुछ खाते,
धरती   को सिंचित करते ही,बादल फिर उड़ जाते l
प्यास बुझाती प्यासे की ही, सरिता लब जल पीती,
पर  उपकारी  जो  होते  हैं, धन्य  वही  हो पाते l

Sunday, 2 September 2018

जहाँ चाह है, वहीं राह है.


इर्ष्या मन में जगे, समझ लो यही डाह है,
पाने  की  इच्छा हो मन में, यही चाह है l
प्रगति पन्थ पर बढने की जिज्ञासा मन में,
सत्य  यही  है, “जहाँ चाह है  वही राह है”l

Wednesday, 29 August 2018

श्रृद्धांजली

श्री पूरन  जी जिला जालौन के प्रसिद्ध कवि एवं रंगकर्मी थे,

पूरन जी  अब  नहीं रहे  हैं, कौन किसे  बतलाये,
पंचतत्व  में  लीन  हो  गये,  इसे  कौन  झुठलाये.
अब तो पूर्ण विराम लग गया, मौन हुये हैं हम सब,
साहित्य जगत में  सूनापन है, कौन राह दिखलाए.
                      डा० हरिमोहन गुप्त 

Friday, 24 August 2018

भारत रत्न श्री अटल बिहारी बाजपेई सृद्धान्जलि,


भारत रत्न स्मृति शेष श्री अटल बिहारी बाजपेई
श्रृद्धांजलि
ओ महान कवि,युग द्रष्टा,ओजस्वी वक्ता,
जो जीवन में, सदा नये रंगों  को भरता.
नई दिशा  दी भारत को, आगे बढ़ने की,
ओ दधीच! तुम जैसा कोन य्हन्हो सकता?
           मौत खड़ी हो जहाँ सामने उसको भी ललकारा,
           रुक जाओ  “स्वाधीन दिवस” भारत  का प्यारा.
           कल चल सकता, विजय “काल के कपाल”पर है,
           ओ नायक ! अब  बोझ उतारा तन  का  सारा.
साहस इतना  अडिग, हिमालय  से  भी  ऊपर,
तुम गम्भीर कि सागर स्वयम सिमिटता भीतर.
पथ संचालक ! तुमने अपनी राह बनाई,
ओ सर्वोत्तम !
नई  चेतना,  नई  दिशा  दी  आगे  बढ़ कर.
            सभी जानते  जो  भी आया गया यहाँ से,
            राम, कृष्ण भी देश छोड़ कर गये जहाँ से.
            उसी लीक पर तुमने भी चल कर दिखलाया,
            ओ शुभ चिन्तक ! तुम भी रहते यहाँ कहाँ से.
“मैं जी भर जिया,लौट कर आऊंगा यह वादा,
वाक्य  प्रेरणा श्रोत,  बात  सीधी  है  सादा.
“प्यादे से  बन कर वजीर” यह ही दिखलाया,
मन  में  हो विशवास और हो  नेक  इरादा.
            लेकिन तुमने जाते जाते  यह दिखलाया,
            भारत अब  सिरमोर जहाँ में  ऐसा पाया.
            उत्तराधिकार दे करके जिसको भार दिया है,
            राह आपकी  चल कर  जिसने गौरव पाया.
आओगे तुम नये रूप में, यह मन कहता,
इस पीढ़ी में आज यही तो सपना पलता.
देखोगे तुम  नये रूप में  इस भारत को,
ऐसा द्रढ़ विश्वास  बनोगे  कर्ता  धरता.
             गीतों के माध्यम से  जो दी थी काव्यांजलि,
             जाने से अब क्या कह दें ? रीती है अन्जलि.
             नये ढंग से  अब  गीतों  को  लिखना होगा,
             भारत रत्न “अटल” तुमको सच्ची श्रृद्धांजलि .
कैसे मानूँ  कभी अटल जी मर  सकते  हैं,
उनके जो सिध्दान्त,उन्हीं पर यदि चलते हैं.
तो मानो यह सत्य, अटल जी नहीं मरेगें,
पद चिन्हों में, शीश आज सबके झुकते हैं.
               डा० हरिमोहन गुप्त

Saturday, 11 August 2018

फर्ज


मुर्गा जो बांग दे कर, सुबह  सबको जगाता है,
शाम को प्लेट में सजकर, सदा को सो जाता है,
उसके उत्सर्ग का यह हश्र होगा, वह क्यों सोचे ?
जगाने  का फर्ज  है उसका, वह  तो निभाता है l

Wednesday, 8 August 2018

माँ वाणी


माँ वाणी मुझ पर रखो, सदा दाहिना हाथ,
कृपा अनवरत ही रहे, सदा रहो तुम साथ l
             लेखन में गति हो सदा, ऐसा हो अभियान,
             गागर में सागर भरूँ, जग का हो कल्याण l
ऐसा कुछ मैं लिख सकूँ, जिसमें हो कुछ सार,
जन  कल्याणी  योजना,  ऐसे  रहें  विचार l
             मैं गुण गाऊँ आपके, आप गुणों की खान,
             काव्य सुधा बरसे यहाँ, बढ़ जाए मम ज्ञान l
क्या  वर माँगू  आपसे,  तुमसे  मेरा मान,
काव्य जगत में बन सके, मेरी भी पहिचान l

Saturday, 4 August 2018

श्रृद्धांजलि


राष्ट्र कवि श्री मैथिली शरण गुप्त=
सुप्त राष्ट्र जाग्रत करने में, कौन  था उनके सद्दश,
उद्घोषक, युग द्दष्टा का  ही, फैलता  जाता सुयश.
यह रहा इतिहास कवि  ही, राष्ट्र का  प्रेरक रहा है,
राष्ट्र कवि सम्मान में हम सब मनाएं “कवि दिवस”

Tuesday, 31 July 2018

कद बड़ा है आपका बस, शाम की परछाई सा


कद बड़ा है आपका बस, शाम की परछाई सा,
असलियत का तो पता, सूरज सुबह बतलायगा l
 सत्य होंगे सब उजागर, दोपहर कल  धूप में,
ध्यान से जब देखना,तो खुद समझ आ जायगा l
                ओढ़ करके यह लबादा, ढोंग का कब तक चलेगा,
                तथ्य जब होंगे उजागर, तब  पता  चल जायगा l
दाग  चेहरे  पर  लगा है, क्या पता है आपको,
आइना बस देखियेगा, खुद व खुद दिख जायगा l
                आप गदगद हैं कि शायद, आपका कद बढ़ रहा,
                दूसरे नापें  ऊँचाई,  तब  कोई   कह  पायगा l
मैं  बड़ा  हूँ, तू  नहीं है, यह लड़ाई आज भी,
सब बराबर हैं जमी पर, कौन यह समझायगा l
                पैर छू लूँगा बड़े के, स्वयम छोटा मान  कर,
                कौन है सबसे बड़ा, यह तो पता चल जायगा l
चार कदमों बाद ही, कहने लगे हम थक गये,
जिन्दगी लम्बा सफर, कैसे  कहो कट पायगा l
                 आप झुक कर तो मिलें, बस आपसे जो भी मिले,
                 आपका कद  तो  बड़ा बस, आप  ही हो जायगा l   


Monday, 23 July 2018

श्रद्धांजलि

श्रद्धेय श्री नीरज को श्रद्धांजलि


जिन्दगी  का मौत  से  ऐसा  लगाव  है,
बदले हुये  लिवास  में  आना स्वभाव है.
थककर सफर में कोई सुस्ताने लगे पथिक,
मैं  सोचता  हूँ  मौत  ही  ऐसा  पडाव  है.
                            डा० हरिमोहन  गुप्त,

Saturday, 21 July 2018

करे तीर का काम,


                      मिथ्या आग्रह, कटुवचन, करे तीर का काम,
                      स्वाभाविक यह प्रतिक्रया, उल्टा हो परिणाम
                             धन संग्रह नहिं धर्म से, उसका करिये त्याग,
                             यथा सर्प  की  केचुली, नहीं  लगेगा  दाग l

Tuesday, 17 July 2018

अब पुराना होरहा है यह मकान


 अब पुराना हो रहा है यह मकान,
                    देखो खिसकने लगीं ईटें पुरानी,
                    झर रहा प्लास्टर कहे अपनी कहानी।
           ज रही अब मिटाने पुरानी शान,
          अब पुराना हो रहा है यह मकान।
                     जब बना था मजबूत थे सब जोड़,
                     रंग रोगन अच्छा रहा बेजोड़।
         सोचता था यह बहुत मजबूत है,
         समय से ,यह खो रहा पहिचान।
         अब पुराना हो रहा यह मकान।
                    जिन्दगी बस इसी ढ़ंग से है बनी,
                    नित नई हैं अब समस्यायें घनी।
         अमर ऐसी कोई काया नहीं,
         सामने दिख रहा, पास में शमशान।
         अब पुराना हो रहा है यह मकान।
                    फट रहे हैं वस्त्र अब वे हैं पुराने, हों नये ही वस्त्र अब मन को लुभाने।
         जो यहाँ आया, गया जगरीत यह, धन्य वह, मिले जाते समय सम्मान।
        अब पुराना हो रहा है यह मकान।