अब हमारे हाथ से लिखने की स्याही भी छिनी आचरण में जो मिली उपलब्धियां किसने गिनीं ? स्वार्थपरता में सभी मिलकर उतारें आरती क्या कहें , किससे कहें , बिकने लगी अब लेखनी - डॉ. हरि मोहन गुप्त
बहता पानी स्वच्छ ओर निर्मल होता है आगे बढने का प्रयास प्रतिपल होता है सागर कब किसको मिठास दे पाया जग में ठहरे पानी में अक्सर दलदल होता है डॉ. हरिमोहन गुप्ता
एक चिंगारी बहुत है घर जलाने के लिए एक रुसबाई बहुतहै गम बढ़ाने के लिए बूद पानी की बहुतहै प्यास बुझने के लिए सुखद घटना ही सही है गम भुलाने के लिए डॉ. हरिमोहन गुप्ता
लगन परिश्रम ,सतत साधना जो अपनाते हैं एकाग्र चित्त अभ्यासी ही मंजिल तक जाते हैं सत्य मार्ग पर चलते जो सेवा व्रत ले कर सच मानो तो वही लक्ष्य को छू पाते हैं डॉ. हरिमोहन गुप्त
तुकबंदी मैं लिखूँ सदा से रही अनिच्छा चुटकीले ही व्यंग्य पढूँ यह कब है इच्छा मैं समाज को देने को ही कुछ लिखता हूँ लेखन हो उद्देश्यपूर्ण मिलती हो शिक्षा - डॉ. हरिमोहन गुप्त
पढ़ कर ,गुनकर गुण दोषों की करें समीक्षा , समय पड़े पर आवश्यक ऊत्तीर्ण परीक्षा लेकिन इतना धीरज रक्क्खे शान्त भाव से, फल पाने को करना पड़ती सदा प्रतीक्षा डॉ हरि मोहन गुप्त
बुधि विवेक युत शिक्षा ही होती संस्कृति है निज कर्मों की प्रति -विम्ब होती आकृति है यों तो आवागमन सत्य है , शाश्वत जग में मरती रहती देह , अमर ही होती कृति है
कंटक मग पर बहती सरिता सबको निर्मल जल मिलताहैं पत्थर चोट सहे पर फिरभी हमे वि तव से फल मिलता हैं जो पर हित में रहते तत्पर .उनका ही भविष्य उज्वल हैं भला करो तो लाभ मिलेगा ,इसका फल प्रति पल मिलता हैं