Sunday, 29 January 2017

इंसानियत में ढूंढिएगा

इंसानियत में ढूंढिएगा , मैं वहीँ मिल जाऊँगा
क्यों व्यर्थ मुझको खोजते हो आप अपने मजहबों में?

-   
      - डॉ. हरिमोहन गुप्त  

Monday, 16 January 2017

क्यों जाऊ मै

क्यों जाऊ मै गंग नहाने, मै तो कर्म प्रधान मानता .
यही मोक्ष दाता सुन लो, सेवा   भाव प्रधान जानता

                                          डॉ हरिमोहन गुप्त 

Sunday, 15 January 2017

अब हमारे हाथ से लिखने की स्याही भी छिनी

अब हमारे हाथ से लिखने की स्याही भी छिनी 
आचरण में जो मिली उपलब्धियां किसने गिनीं ?
स्वार्थपरता में सभी मिलकर उतारें आरती 
क्या कहें , किससे कहें , बिकने लगी अब लेखनी 
- डॉ. हरि मोहन गुप्त

घरी घरी देखें घड़ी

घरी घरी देखें घड़ी , कौन घड़ी वे आयें
घरी घरी पल - पल गिनें , घरी घरी अकुलाएँ
डॉ. हरि मोहन गुप्त

बहता पानी स्वच्छ ओर निर्मल होता है आगे

बहता पानी स्वच्छ ओर निर्मल होता है आगे 
बढने का प्रयास प्रतिपल होता है 
सागर कब किसको मिठास दे पाया जग में 
ठहरे पानी में अक्सर दलदल होता है 

डॉ. हरिमोहन गुप्ता

एक चिंगारी बहुत है घर जलाने के लिए

एक चिंगारी बहुत है घर जलाने के लिए 
एक रुसबाई बहुतहै गम बढ़ाने के लिए 
बूद पानी की बहुतहै प्यास बुझने के लिए 
सुखद घटना ही सही है गम भुलाने के लिए 

डॉ. हरिमोहन गुप्ता

आया है नयावर्ष

आया है नयावर्ष करते हम अभिनन्दन 
हमसे जो अग्रज हैं उनका करते वंदन 
छोटों को शुभाशीस मगल मय हो जीवन 

डॉ. हरिमोहन गुप्त

लगन परिश्रम ,सतत साधना

लगन परिश्रम ,सतत साधना जो अपनाते हैं
एकाग्र चित्त अभ्यासी ही मंजिल तक जाते हैं 
सत्य मार्ग पर चलते जो सेवा व्रत ले कर 
सच मानो तो वही लक्ष्य को छू पाते हैं 

डॉ. हरिमोहन गुप्त

नेह से नाता रहा मनमीत का

नेह से नाता रहा मनमीत का ,
सद भाव से नाता रहा 
प्रीत का 
गीतकारो ने सदा से यहकहा ,
दर्द का रिश्ता पुराना गीत का .

डॉ. हरिमोहन गुप्त

तुकबंदी मैं लिखूँ सदा से रही अनिच्छा

तुकबंदी मैं लिखूँ सदा से रही अनिच्छा 
चुटकीले ही व्यंग्य पढूँ यह कब है इच्छा 
मैं समाज को देने को ही कुछ लिखता हूँ 
लेखन हो उद्देश्यपूर्ण मिलती हो शिक्षा 
- डॉ. हरिमोहन गुप्त

दोषों की करें समीक्षा

पढ़ कर ,गुनकर गुण दोषों की करें समीक्षा ,
समय पड़े पर आवश्यक ऊत्तीर्ण परीक्षा 
लेकिन इतना धीरज रक्क्खे शान्त भाव से,
फल पाने को करना पड़ती सदा प्रतीक्षा 
डॉ हरि मोहन गुप्त

जो माया के दास

जो माया के दास , वही रहते उदास 
छोड़ो उसको सब कुछ , रहे आपके पास
डॉ. हरिमोहन गुप्त

भावना में ही निहित भगवान् है

भावना में ही निहित भगवान् है , ज़िन्दगी का साथ ही सहगान है
दर्द बांटे दीं हीनों का कोई , तब कहीं मिलता उसे सम्मान है
डॉ. हरिमोहन गुप्त

Friday, 6 January 2017

शिक्षा

बुधि विवेक युत शिक्षा ही होती संस्कृति है
निज कर्मों की प्रति -विम्ब होती आकृति है
यों तो आवागमन सत्य है , शाश्वत जग में
मरती रहती देह , अमर ही होती कृति है
डॉ. हरिमोहन गुप्त

Thursday, 29 December 2016

कंटक मग पर बहती सरिता

कंटक मग पर बहती सरिता सबको निर्मल जल मिलताहैं 
पत्थर चोट सहे पर फिरभी हमे वि तव से फल मिलता हैं 
जो पर हित में रहते तत्पर .उनका ही भविष्य उज्वल हैं 
भला करो तो लाभ मिलेगा ,इसका फल प्रति पल मिलता हैं

बहता पानी स्वच्छ ओर निर्मल

बहता पानी स्वच्छ ओर निर्मल होता है आगे 
बढने का प्रयास प्रतिपल होता है 
सागर कब किसको मिठास दे पाया जग में 
ठहरे पानी में अक्सर दलदल होता है

एक चिंगारी

एक चिंगारी बहुत है घर जलाने के लिए 
एक रुसबाई बहुतहै गम बढ़ाने के लिए 
बूद पानी की बहुतहै प्यास बुझने के लिए 
सुखद घटना ही सही है गम भुलाने के लिए

Tuesday, 27 December 2016

भरने को पेट एक दिन

भरने को पेट एक दिन ,उसे रोटी खिलाइए 
कल कैसे कमाएरोटी इसको सिखाइए 


डा हरि मोहन

फासला घट जाएगा , हमदम बनाओ

फासला घट जाएगा , हमदम बनाओ
हो सके तो तुम किसी का ग़म मिटाओ
शान्ति सुख पा जाओगे यह देखना तुम
बस किसी के घाव पर मरहम लगाओ
डॉ. हरिमोहन गुप्ता