Thursday, 15 October 2020

 

              शहीदोंतुमको मेरा नमन

ज्ञात और अज्ञात शहीदोंतुमको मेरा नमन,

साथियो तुमको मेरा नमन

|न्योछावर हो गये देश पर,

अर्पणकर तन मन,

तुमने सच्चे मन से माना भारत माता,             

अन्त समय तक तुमने रक्खा उससे नाता,

प्राणो का उत्सर्ग सहज हीपाला ऐसा प्रण।

निभाया, तुमने दिया वचन।शहीदों, तुमको मेरा नमन l

तिलक लगा कर माता ने भेजा था रण में,

बहिनों ने राखी बाँधी तुमको सावन में l

भारत की रक्षा करना है,माँ का यही कथन ,

शहीदो तुमको मेरा नमन l

दे कर के सौभाग्य तिलक पत्नी ने भेजा,

रक्षा का ही भार स्वयम ही तुम्हे सहेजा l

भारत की रक्षा को करते ,होम दिया योवन ,

,शहीदो तुमको मेरा नमन l

था स्वदेश से प्रेम, उसी हित डंडे खाये,

सहीं यातनाएं फिर भी कब घवडाये l

मातभूमि की रक्षा के हित,तोड़ दिये बन्धन,

शहीदो तुमको मेरा नमन l

श्रृद्धांजलि अर्पित करते भारत के जन जन,

आज तुम्हारे ही कारण से मिला हमे जीवन l

समर्पित तुमको श्रद्धा सुमन ,

शहीदो तुमको मेरा नमन l

 डा० हरिमोहन गुप्त 

Tuesday, 13 October 2020

 

आज पीड़ा हो गई इतनी सघन,

नीर बन कर अब बरसना चाहियेl

    चारों तरफ ही मच रहा कुहराम है,

       शान्ति को मिलता नहीं विश्राम है,

       आज रक्षक ही यहाँ भक्षक हुये,

       देश की चिंता जिसे, गुमनाम है l

कर्ण धारों के हुये मिथ्या कथन,

पन्थ कोई अब बदलना चाहिये l

       रोज हत्या का बढ़ा है अब चलन,

       छवि यहाँ धूमिल, हुआ उसका क्षरण,

       हम कहाँ, कैसे, बताओ रह सकें,

       आज हिंसक हो गया है आचरण l

यह समस्या आज देती है चुभन,

हल कोई इसका निकलना चाहिए l

        प्रांत सब ज्वालामुखी से जल रहे,

        आतंक वादी अब यहाँ पर पल रहे,

        कोन रह पाये सुरक्षित सोचिये,

आज अपने ही हमी को छल रहेl

दर्द है, कैसे करें पीड़ा सहन,

कोई तो उपचार करना चाहिये l

         आज भ्रष्टाचार में सब लिप्त हैं,

         घर भरें बस, दूसरों के रिक्त है                        

         दूसरे देशो में अब धन जा रहा,

         देख लो गाँधी यहाँ पर सुप्त है |

क्या करें, कैसे करें,इसका शमन,

प्रश्न है तो हल निकलना चाहियेl

       देश तो अब हो गया धर्म आहत,

         बढ़ रहा है द्वेष, हिंसा, भय, बगावत, 

         आज सकुनी फेकते हैं स्वार्थ पांसे,

          एकता के नाम पर कोई न चाहत l

किरकिरी है आँख में देती चुभन,

कष्ट होगा पर निकलना चाहिए l

          देश हित में सब यहाँ बलिदान हों,

          विश्व गुरु भारत रहे, सम्मान हो ,

          सत्य का सम्बल सदा पकड़े रहें,

          एकता में बंध, नई पहिचान हो l

आज सबसे है, यही मेरा कथन,

एक जुट हो कर, सुधरना चाहिये l

Monday, 7 September 2020

 

 

          पानी रखो सँभाल, नजरों से यदि गिर गया,

          समझो आया काल, बिना मौत ही वह मरा |

  ऐसा  करो  प्रयास, आँखों  में  पानी  रहे,

  प्रभु जी आते पास, निर्बल को सम्बल मिले |

                              

             पावस ऋतु

  पावस ऋतु का आगमन, मन में उठे हिलोर,

 चंहु दिश  ढूढू उसी को, कंहा रहा  चितचोर |

                सोंधी खुशबू आ रही, होती है बरसात,

               हरयाली बिखरी यहाँ,मन प्रसन्न हो जात |

  दादुर स्वर लगते भले, बिजली चमके रात,

  पानी बरसे जब यहाँ, सच में सभी  सुहात |

                  मोर नाचती देख कर, गाऊं  मैं  मल्हार,

                   आओ नाचें हम सभी, पावस चले बयार |

  प्रिय के बिन पावस ऋतु, लगती है बेकार,

  मैं सजधज कर क्या करूँ, क्यों पहिनूं मैं हार |

                    बादल काले देख कर, मन भी  होत उदास,

                    छवि उसकी ही उभरती, आ जाये वह पास |

  नभ में बादल जब कभी, लिख जाते  हैं नाम,

  उसकी छवि ही प्रगट हो, दिख जाते घनश्याम |

                                 डा० हरिमोहन गुप्त

Sunday, 12 July 2020

saamyik doha

समस्या पूर्ति दोहा     द० हरिमोहन गुप्त
              “सामाजिक”
भाई ,भाई से लड़ें, अलग अलग  हों द्वार,
अपना घर बंट जाय तो ,कब रहता है प्यार l
  कल तक सबमें प्रेम  था, आदर  था सदभाव,
 अलग अलग अब हो गये, बदले सभी स्वभाव l
आँगन में दीवाल हो, सभी चाहते आज,
अपने अपने रास्ते, अपने अपने काज l
      तार तार ही हो रहे, अब सितार के तार,
      ऐसे घर  भी कलह से, हो  जाता बेजार l
मात, पिता को बाँटते, कैसे  हो निर्वाह,
कैसे हम रह पायंगे, कहाँ गई वह चाह l
     
 बंटबारा ऐसा किया, हुई परिस्थिति दास,
 माता रक्खें आप ही, पिता  हमारे पास l
पास पड़ोसी कह रहे, देख  हमारे ढंग,
देखो इनके भी हुये, चेहरे अब भदरंग l
       कैसे सिर ऊँचा करें, झुके  हमारे शीष,
       यही चाहते सभी, मन में थी यह टीस l 
सास बहू में हो रहा, आपस में टकराव,
घ में पंचायत जुड़ी, बना रहे सदभाव l
    सास बहू में हो रही, अब तो नित तकरार,
    पुत्र तुम्हारा है कहाँ,  पति  अब  दावेदार l
दोनों में कोई नहीं, झुकने को तैयार,
पिता,पुत्र भी मौन हैं, देख रहे हैं रार l
 

Wednesday, 10 June 2020

हिम्मत

मन में हम उम्मीद जगाएं, हिम्मत ना हारें,
तो हममें उत्साह जगेगा, इसको स्वीकारें |
शान्ति और सुख आ जायेगा, इसको हम मानें,
तभी स्वयं समृद्धि बढ़ेगी,इच्छायें मारें |

Friday, 5 June 2020

जल से सम्बन्धित सोरठा

       जल से सम्बन्धित सोरठा
  उत्तम यही विचार, सन्चित जल को हम करें,
  खोदें  गड्ढे  चार,  वर्षा  जल  उसमें  भरें |
         पानी है अनमोल, रक्खें इसे सँभाल कर,
         आदि पुरुष के बोल, व्यर्थ नहीं बह यह |
   यह जीवन का सार, पानी आवश्यक यहाँ,
   भोजन भी बेकार,  नहीं साथ में जल रहे |
          मत कर जल बर्बाद, दुख पाओगे तुम अवश,
          इतना रखना याद, जल ही  जीवन है  सदा |
   जल बिन जैसे मीन,  नहीं भूमि पर रह सके,
   यह काया  भी दीन,  कैसे  भवसागर  तरे ?
          पानी रखो सँभाल, नजरों से यदि गिर गया,
          समझो आया काल, बिना मौत ही वह मरा |
  ऐसा  करो  प्रयास, आँखों  में  पानी  रहे,
  प्रभु जी आते पास, निर्बल को सम्बल मिले |
                             डा० हरिमोहन गुप्त


Thursday, 4 June 2020

बुन्देली में चिट्ठी

   “चिट्ठी”
चरन छुअत हैं हमइ इते सें,
          सो सब ही स्वीकारो,
कैसे दद्दा बाई उते हैं,
          कैसो हाल तुम्हारो.
कैसी भइ जा साल फसल,सब-
          कागज पे लिख दइयो,
साहूकार खों कछु दे पेहो,
          हमको इतइ बतइयो.
सोची थी जा साल कछू तो,
           तनखा बढ के मिल है,
कछू भेज दें हैं, हम तुमखों,
           मन सबको बस खिल है.
लेकिन का केदें हम भइया,
          महँगाई ने खा लओ,
रोजइ सोचत कछू बचा लें,
          हाथ कछू नइ आ रओ.
सात हजार कमरा के दे रय,
          सात हजार खाबे के,
तीन हजार मोटर के लग रय,
           बस दफ्तर जाबे के,
कपड़ा तो हम घरइ धोऊतइ,
           बाहर प्रेस करा रय,
पाँच हजार ऊपर उठ जातइ,
           कछू जोर नइ पा रय.
सबरी तनखा भुक हो जातइ,
           का हम तुमसें कै दें,
सोचत सोचत प्रान सुखा लय,
           साँची हम सब कै दें.
पर होनी खों का हम कै दें,
           इते पर रहे लाले,
खूब जुगत से खरचा कर रय,
           पाउन पर गय छाले.
सोची थी दिल्ली में जा कें,
          रुपया खूब कमा हैं,
सबरे खरचा काट कूट कें,
          रुपया इते बचा हैं.
देखो संजा के कऊँ जा के,
          कोनउ जुगत लगा हैं.
दो घंटा बस उते काम कर,
          कछू जोर हम पा हैं,
धीरज धरियो जा साले हम,
          दस हजार पहुँचा हैं,
कछू जोर कें तुम दे दइयो,
          करजा सबइ मिटा हैं.
जादा का हम लिख दें भइया,
          बाई दु:ख न पाबें,
दद्दा सें अब काम बनत नइ,
             बैठे बैठे खाबें.
भोजी के हम चरन छुअत हैं,
             सुख से तुम सब रहियो,
चुन मुन, गुड्डू रहें प्यार सें,
             आसिस मेरो कहियो.
    

Tuesday, 2 June 2020

मुक्तक


     नजरों  के  पास, किन्तु किनारों की तरह,
     देख तो सकते, मगर दूर सितारों की तरह l
     स्वप्न हैं, जरूरी नहीं  पूरे  हो जायँ कभी,
      दूरियाँ, मजबूरियां हैं, जब दरारों  की तरह l

Sunday, 31 May 2020

फर्ज


हम करें उनको नमन बस,कीर्ति ही जिनकी कहानी,
देश हित में  प्राण दे कर, होम  दी  अपनी जवानी |
         कर्ज भारत भूमि का है, प्रथम मैं पूरा करूंगा,
         माँ वचन मेरा तुम्हें, मैं लौट कर शादी रचूंगा |
पर निकट  उत्सर्ग मेरा, पुत्र तेरा  स्वाभिमानी,
माँ मुझे तुम क्षमा करना, जा रही है यह निशानी |
         पापा वचन “सौ मार कर, होना निछावर देश पर,
         याद  है,  मारे हजारों, कप्तान के  आदेश  पर |
किन्तु घायल हो गया हूँ, हो रही है अब रवानी,
कष्ट मुझको है नहीं अब, नींद  आयेगी सुहानी |
         कह के आया, आऊँगा, इस  वर्ष  सावन  में,
         सूनी कलाई जा रहा, दृढ संकल्प ले  मन में |
देश सर्वोपरि हमारा, फर्ज की कीमत चुकानी,
अब मुझे होना निछावर, वीरता मुझको दिखानी |
         कर्म पथ पर बढ़ चले जो, याद उनकी आज घर घर,
         जब जरूरत आ  पड़ी तो, वे  गये आदेश  पा कर  |
सुमन श्रृद्धान्जलि समर्पित, मूक होती आज वाणी,
देश पर होंगे निछावर, बस यही अब कसम खानी |
                   देश हित में प्राण दे कर, होम दी  अपनी जवानी,
                हम करें उनको नमन बस, कीर्ति ही जिनकी कहानी |
 



Friday, 29 May 2020

अपना गाँव


जाकर देखेा, गाँवों के वे कुआँ, नदी, तालाब, झील सब,
तुमको लगता पानी, मेरे लिये वही तो गंगाजल है।
         बिरिया, झरिया के हैं बेर,यहाँ वहाँ, खेतों की मेंड़ों पर,
         गदराते हैं आम, और जामुन, खाते हैं ऊपर चढ़ कर।
तुमको लगते होंगे खट्टे, मुझको मीठे अमृत फल है।
तुमको लगता पानी, मेरे लिये वही तो गंगा जल है।
         मिट्टी में सोंधापन हर अषाड़ में, कभी खुला आकाश,
         खेत किनारे ही बबूल पर, रात जुगनुओं का प्रकाश।
भले तुम्हें तो लगे अँधेरा, राह दिखाने को सम्बल है।
         पंछी  के कोलाहल,  भोंरों की  गुंजन,  सुबह शाम  को,
         ये भरते आनन्द मनों में, ताजा करते पुऩः काम को।
तुमको कैसा लगता, पर सच में, आनन्द यहाँ प्रतिपल है।
        गाँवों की गलियाँ, हरयाली खेतों की, मन प्रसन्न करती,
        यहाँ प्रदूषण मुक्त वायु, आपस में सद्भाव सदा भरती।
अगर देखना भीड़ यहाँ, शाम को, चोपालों पर हलचल है।
       घर  आँगन  की  सब्जी,     दालें, बस कढ़ी भात संग,
      छप्पन व्यंजन से भी बढ़ कर, खाते हैं जब बैठें संग संग।
  तुमको कैसा लगे, यहाँ तो होता सब का ही मंगल है।
      होली और दिवाली, सावन सभी मनाते वे सब मिल कर,
      साँयकाल बैठ कर गाते, भजन सुनाते वे सब मिल कर।
सीधे सच्चे परम हितेषी, भाव यहाँ मन में निश्छल है।
      आपस में मिल कर रहते, वे लड़ाई झगड़ा क्या जाने ?
      सभी बराबर ,ऊँच नीच का, भेदभाव भी कब वे मानें ?
तुम मानो या ना तुम मानो, पंथ यहाँ का यही सफल है।
      गृह कुटीर  उद्योग  यहाँ  पर,   आवश्कता पूरी करते,         
      सादा जीवन कम इच्छायें, स्वाभिमान को जीवित रखते।
व्यस्त सभी हैं, अति प्रसन्न हैं, भाग्य यहाँ  सबका उज्जवल है।
     चन्दन, हल्दी के उपटन से , निखरी जिसकी कोमल काया,
      हाथों पावों में मेंहदी,  माथे पर  बिन्दी से  उसे सजाया।
तुमको क्या लगता क्या जानें? उसमें भाव भरा निश्छल है।
सदा नगर से दूर गाँव में, होता सबका ही मंगल है