भृष्टाचार मिटाना
हमको, यह
ले लें संकल्प,
हर कीमत पर इसे
हटाना, कोई
नहीं विकल्प,
कोढ़ सरीखा है यह
जग में, नहीं इसे
पनपायें,
अधिक बढ़ गया तो
फिर सोचो,होगा कोई प्रकल्प ?l
हम सुधरेंगे, जग सुधरेगा, यही बात
है शास्वत,
दृष्टिकोंण
बदलें हम अपना, इस में है अपना हित |
गुण अन्वेषण हो
स्वभाव में, हम समाज में जाएँ,
घृणा, द्वेष, दुर्भाव त्याग
कर, खुद को करें समर्पित |
हमको क्या करना
है जग में, लक्ष्य बनाओ निश्चित,
जीना,मरना तो जीवन क्रम,भटके, हुये पराजित |
आये हैं किस हेतु
धरा पर, इस पर करिये मंथन |
व्यर्थ जायगा यह
जीवन ही, फिर क्या मिले कदाचित |
चढ्ना है पहाड़
के ऊपर, झुक
कर चढना होगा,
अगर चाहते
मन्जिल पाना, रुक कर चलना होगा |
अकड दिखा कर जो
भी चलता, ठोकर खा गिर जाता,
लक्ष्य प्राप्ति
हित,हो प्रयास रत, गिर कर उठाना
होगा |
लक्ष्य सामने रखने वाले, कभी नहीं रुकते हैं
जो श्रम के आदि हो जाते , कभी नहीं थकते हैं
धीरे धीरे चलो , सामने लक्ष्य बनाओ निश्चित
तुलसीदास=
हिन्दी के
साहित्य में राम रहे
हैं पास,
उनके चरणों
में झुके धरती औ आकाश.
वे जीवित हैं आज, जियेंगे
युगों युगों तक,
हिन्दी के
साहित्य शिरोमणि सबकेतुलसीदास.
(ब
रामचरित मानस को लिख कर,
किया विश्व में
अपना नाम,
वेद, पुराण,उपनिषद को भर,
कर डाला
ऐसा था काम.
राम नाम की
महिमा गा कर,
घर घर में बैठे श्री राम,
तुलसी को रवि माना जग ने,
हम उनको बस करें
प्रणाम.|