Tuesday, 11 October 2022

 

 भव तारक  हे राम तुम, तारो मैं  हूँ दास,

 मुझे शरण में लीजिये, चरणों में हो वास |

 सदा दीन पर नेह है, राम तुम्हीं से आस,

 दीन बन्धु तुम जगत के, ऐसा है विश्वास |

 

 

अनुपम छवि है कृष्ण की, कोई नहीं विरोध,

लो वंशी संग धनुष  भी, केवल यह अनुरोध l

मोहक छवि है कृष्ण की, मन में है साकार,

धनुष,वाण कर में गहो, तो होगा उपकार |

 सुन अभिषेक प्रसन्न नहिं,सुन वनवास न ग्लान,

 ऐसी ही मति  दो मुझे, राघव राम  सुजान |

 

 

 

 

 

Monday, 10 October 2022

भजन

 

पिंजरा तो खाली करना है, रहता किस उलझन में,                                                                                      

                 प्राणी, सोच रहा क्या मन में l

विखर जांयगे फूल  सभी जो, महक रहे उपवन में,

पंछी कहता उड़ो यहाँ  से, क्यों  रहता  बन्धन में,

                  प्राणी, सोच रहा क्या मन में l

व्याकुल हो यह  ही कहता है, क्या  है मैले तन में,

अगले पल की खबर नहीं  है, चला जायगा क्षण में,

                   प्राणी, सोच रहा क्या मन में l

कौन देख पाया है कल को, व्याप्त वही कण कण में,

आस दूसरे की  क्या  करना, खुद  देखो  दर्पण  में,

                    प्राणी, सोच रहा क्या मन में l

जाने  की  बारी  जब आई, लिप्सा क्यों  है  धन में,

अब  भी  समय सोच ले प्राणी, रहना  नहीं चमन में,

                     प्राणी, सोच रहा क्या मन में l

समय  बीत  जायेगा  तब  फिर, पछताये  जीवन  में,

चार दिनों  का  समय मिला था, गँवा दिया अनबन में,

                     प्राणी, सोच रहा क्या मन में l

डा0 हरिमोहन गुप्त

Sunday, 9 October 2022

                                              रसना भज श्री राम को,यदि चाहो उद्धार,

सदा कर्म  में लीन जो, उसका बेड़ा पार l

सच्चे मन से राम को,जो भी करता याद,

कार्य सफल होते सभी ,उपजे नहीं विवाद l

दुख होता   जब सामने, भजते  सब  श्री राम,

यदि सुख में भजते रहें, दुखका फिर क्या काम l

राम नाम महिमा सुनी, यह  है सच्ची बात,

जो भजता श्री राम को, सुख पाता दिन रात l

मन पवित्र यदि आपका,तो मिल सकते राम,

                  भाव समर्पण का रखें, सफल सिद्ध परिणाम 

Saturday, 8 October 2022

गजल

 

  राम नामी ओढ़ कर

 

राम नामी ओढ़ कर, मैं ठग रहा होता जगत को,         

किन्तु मानव धर्म से  ही, हारता हरदम रहा बस l

       चाहता तो यह सफर मैं, पार कर लेता मजे से,

       गैर की  ही  रहनुमाई, ढूढ़ता हरदम  रहा बस l

मन्च के सम्मान सब मैं, प्राप्त कर लेता सहज ही,

चाटुकारों  से  हमारा, फासला  हरदम  रहा  बस l

     लूटता  मैं  आबरू,  झूठे  दिलासों  के  सहारे,

    किन्तु जो अन्तस् में बैठा, रोकता हरदम रहा बस l

आतंक का साया बना कर, चाहता यश कीर्ति पाना,

भाई चारा  प्रेम  ही, पुचकारता  हरदम  रहा  बस l

     स्वार्थ का सम्बल लिये मैं, पहुँच जाता बहुत ऊपर,

    स्वाभिमानी मन मेरा, धिक्कारता हरदम  रहा बस l

जो लुभाये मन्च को, सच वह कला मैं जानता था,

किन्तु अन्तरद्वन्द ही, दुतकारता हरदम रहा बस l

     झूठ के पेबन्द  से, सच  को छिपाना चाहता था,

     किन्तु अन्तर्मन मेरा, झकझोरता हरदम रहा बस l

 

                    डा0 हरिमोहन गुप्त

 

Friday, 7 October 2022

भजन

 

 राजा से अब नहीं,मुझे तो उससे कहना,   18

 वह है पालनहार, वही  है मेरा अपना  |

              आधी रात चला आता  है  दया दिखाने,

              सभी तरह के दुःख,भय,या आपत्ति हटाने |

              सब फीके  हैं, उसके आगे  सब दरबारी,

              वह समर्थ है, मुझको अपना पाठ सिखाने |

       उसके जो निर्देश, मुझे तो वह ही करना,

       सारे झन्झट छोड़, मुझे उसके संग रहना |

              मुझ पर कृपा राम की रहती, उसकी छाया,

              उसके  चरणों में  झुक  जाती  मेरी काया |

              राजा की चौखट पर जा कर, क्या मैं माँगूं,

              उसके दर पर आकर, मेने सब कुछ पाया |

       धर्म नीति की बहे  पवन, उस संग ही बहना,

       उसके  ही  आदेश  मुझे  सिर  माथे  धरना |

              उसके प्रति सद्भाव, समर्पण हो बस मन से,

              श्रृद्धा औ विश्वास  जगे,  मेरे  जीवन  से |

              क्या करना है,  कभी जाऊं  राजा के द्वारे,?

              मेरा तो  उद्धार निहित है  राम  भजन से |

 

 वह हीरे का हार, वही  सोने का  गहना,

  मैं सेवक हूँ, स्वामी है वह, इतना कहना |

       डा0 हरिमोहन गुप्त    

Thursday, 6 October 2022

 

दिन मे राजा ओरछा, रात्रि  अवध विश्राम,

ऐसे हैं श्री राम जी, उनको  सतत प्रणाम |

कह कर ही वे आय थे, होंगे  राजा राम,

सबको यह स्वीकार था, भज मन आठों याम |

जहाँ  बैठ जाएँ  वहीं, होगा  मम  आवास,

महल विराजे राम जी, वह ही मन्दिर ख़ास |

पुख्य पुख्य  नक्षत्र में, चले   ओरछा दाम,

राज तिलक भी पुख्य में, राजा हैं अब राम |

जो भी आते द्वार पर, विमुख न जाते लोग,

राम भला सबका करें, कर लो तुम उपयोग |

ऐसी  है  मन  कामना, हे  मेरे  श्री राम,

 दास  मान रक्खो यहाँ, या राखो निज धाम |

Wednesday, 5 October 2022

रावण

 

                रावण

  जिज्ञासा है,स्वाभिवक है,सबके मन में प्रश्न यही है,

  मर कर भी क्या रावण अब भी यहाँ अमर है?

  मेरा तो विश्वास, देह मर जाया करती,

  पर मानव के कर्म और गुण जिन्दा रहते |

  क्रोध, क्रूरता,लोभ,मोह,मद अगर रहेगा,

  ईष्या,अनाचार का चादर जो ओढेगा,

  अविवेक,व्यभिचार साथ में जो पालेगा,

  तो यह मानो किसी भेष में,

  रावण जिन्दा बना रहेगा |

  रावण के पुतले को मात्र जला कर हम यह सोचें,

  हर बुराई अब विदा हो रही- तो यह भ्रम है |

  कडुवा सच है, फिर से रावण जन्मेगा हर युग में,

  दुष्प्रवृत्ति या अनाचार यदि यहाँ बढ़ेगा अमरबेल सा,

  चरित्रहीनता,महिला उत्पीड़न, अहंकार जब भी पनपेगा,

  किसी रूप में तुम यह मानों, रावण जिन्दा बना रहेगा |

    डा0 हरिमोहन गुप्त

Tuesday, 4 October 2022

मुक्तक

 

आओ करें  सँगठन  मारें  अहंकार  का  रावण,

और भयातुर कंस  मार कर  ढूढें  उसका कारण.

यहाँ पनपती ,हिंसा, चोरी, असत भावना निशदिन,

मिलकर उसको रोक सकें तो तभी शान्ति संचारण

डा0 हरिमोहन गुप्त .

Sunday, 2 October 2022

श्रद्धांजली

 

आज का  पावन दिन दो महा पुरुषो को समर्पित-

एक राष्ट्र पिता महात्मा गांधी, दूसरा पूर्व प्रधान मंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री को-

एक प्रश्न जाग्रत था मन में,
मानव क्या जिन्दा रहता,
मर कर भी इस जग में ?
रुक जाती है साँस, हृदय स्पन्दन रुकता,
लेकिन कुछ के वाणी के स्वर,
गूँज रहे रग रग में।

मेरा कुछ ऐसा विचार है,
मानव के ही कर्म ओर गुण जिन्दा रहते,
मिट्टी की यह देह मरे, मर जाये तो क्या?
जग के सम्मुख, वाणी के स्वर ,
मानवता जिन्दा रहती है।

जब तक हममें,
सत्य अहिंसा, क्षमा, दया का भाव,
धरा पर धर्म कहाये
विश्व बन्धु का पाठ,परस्पर प्रीति बढा कर,
सुख समृद्धि शान्ति हित जीवन,

सन्तत ऐसी फसल उगाये।

हिन्दू, मुसलमान, ईसाई,
हरिजन को भी गले लगा कर,
कहें परस्पर भाई भाई।
ऐसे स्वस्थ विचार अगर जीवित हैं मन में,
तो गाँन्धी जिन्दा हैं मानो
हम सबके ही तन में।

इसीलिये तो शायद गाँधी नहीं मरे हैं,
नहीं मरेंगे।
युग युग तक उनके चरणों में ,
जाने कितने शीष झुकेंगे।

-    श्री लाल बहादुर शास्त्री

गांधी के सच्चे अनुयायी,थे करुणा के सागर,

रहे सत्य के सदा समर्थक,सबके प्रति था आदर \

गूँज रहा है”जय जवान का जय किसान” का नारा,

भारत  के प्रधान  मंत्री  थे   ऐसे लाल  बहादुर |

-    डॉ. हरिमोहन गुप्त

Saturday, 1 October 2022

 राम नाम में लीन जो, मिलता उसे प्रसाद,

जीवन सुख  से बीतता, रहता नहीं प्रमाद l

क्या माँगू मैं राम से, वे तो हैं जगदीश,

रहूँ स्वस्थ सानन्द मैं, यह दे दें आशीष l

क्या करना धन जोड़ कर, निर्धन के धन राम,

मृदु वाणी अरु सत्य से, बस रक्खो तुम काम l

नाता जोड़े राम से, छोड़ें सब छल छन्द,

सीमित इच्छा  में  रहें, वे रहते सानन्द l

कष्ट  सभी  के  काटते, ऐसे  हैं  श्री  राम,

सुख दुख में बस राम को, भजिये आठों याम l

डा0 हरिमोहन गुप्त 

Friday, 30 September 2022

muktak

 

राम का आदर्श अनुकरणीय है,

कृष्ण का सानिध्य स्मरणीय है |

आप में सामर्थ है कुछ बन सको,

अनुकरण करिये तो आदरणीय है |

भारत को माता माना है, प्राण निछावर की ठानी है,

जान हथेली पर रखते हैं, हममें हमीद से मानी हैं |

हम अनेक में एक रहे हैं, जीवन,मरण लगे उत्सव सा,

भले कौम के कोई रहें हम, पर पहिले हिन्दुस्तानी हैं |

डा0 हरिमोहन गुप्त

अडिग हिमालय से हैं हम सब, सागर सी गहराई है,

देश बड़ा  है, हम से  बढ़ कर, ऐसी  शिक्षा पाई है |

भारत में भी कभी स्वार्थवश, जयचंद यहाँ पैदा होते,

प्राणों  की  आहुति  देते हैं,  हमीं  चन्द्रवरदायी हैं |

 

Thursday, 29 September 2022

dohe

 

दु:ख सभी हरते वही, मन मत करो उदास,

सुख देते  हैं  रामजी, रखो हृदय विश्वास l

लीला सब प्रभु राम की,रहो राम में लीन,

आश्रय पाओ राम का, सदा रहो तल्लीन l

राक्षस कुल का नाश कर, विजयी हुये थे राम,

अहंकार  जिसने  किया, उसको  लगा विराम l

सद्प्रवृति अपनाये जो, उसको मिलते राम,

दुष्प्रवृति हम  छोड़  दें, बन जायेंगे काम l

राम सहायक ही रहें, पवन पुत्र हनुमान,

हम भी सेवक राम के,गायें प्रभु के गान l

डा0 हरिमोहन गुप्त

Wednesday, 28 September 2022

दोहे

                                            भज कर देखो राम को,तब होगा विश्वास,

आवश्कता  जब पड़े, पाओगे  तुम  पास l

राम चरित  जो  पढ़ेंगे, गायेंगे  गुण गान,

यह मानो विश्वास तुम, होगा जग कल्याण l

दुख में भजते राम को, सुख में जाते भूल,

 सुख में यदि भजते रहें, राम सदा अनकूल 

         क्या करना कुछ जान कर, मत सोचो परिणाम  परिणाम                     सम्भव सब कुछ नाम  में, तुम्हें  मिलेंगे राम l

राम   रहे आदर्श  हैं, जो  भजते  हैं राम,

करें सभी हम अनुकरण,ले कर उनका नाम l

रा                          डा0 हरिमोहन गुप्त