उद्घोषक, युगद्दष्टा, सृष्टा, जन जन की पहिचान है,
स्वावलम्व, निर्देशक युग का, स्वर लय में
सहगान है l
आजीवन
निर्धन रह कर भी, सत्य रहा है सम्बल,
इसीलिये युग युग
से कवि को, मिला सदा सम्मान है l
बच कर हम
सबको रहना है, खोद रहे जो खाई,
भारत माँ के हम
सपूत हैं, आपस में हम हैं भाई l
हिन्दू को
मस्जिद प्यारी है, मुसलमान को हर मन्दिर,
मत बांटो, हम भारत वासी,
हिन्दू मुसलमान ईसाई l
राज तिलक जब
सुना राम ने, तभी हुये वनवासी,
लक्ष्मण क्या
पीछे रह सकते, बने
राम विश्वासी l
सीता कैसे साथ
छोड़ती, सुख वैभव को त्यागा,
सुन कर राम गये हैं वन में, भरत बने सन्यासी
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