दीनों की पीड़ा हरें, उससे हो पहिचान,
सुख समृद्धि ही बढ़ सके, उसमें है कल्याण l
कान दूसरा क्यों सुने, आँख बने अनजान,
निर्बल, निर्धन न रहे, यही सुकृत का दान l
अकर्मण्य जो भी होते हैं ,उनको विपदाओं ने घेरा,
मुर्गा होता नहीं गाँव में, तो क्या होता नहीं सबेरा l
कर्म प्रधान मानते जो भी, वे ही लक्ष्य प्राप्त कर पाते,
भाग्य भरोसे जो भी रहते, उनका जीवन रहा अँधेरा l
योग्यता नहीं आज, पद ही मापदण्ड है,
अतीत सामान्य, पर वर्तमान प्रचण्ड है l
भावना मन्दिर में, मूर्तियों में भेद रहे,
तो,गौरव,प्रतिष्ठा,सम्मान खण्ड खण्ड है l
श्रमित समय का अंशदान जिनका है जीवन,
सहभागी हो कष्टों में, जो हैं पीड़ित जन l
सब में हो सदभाव, साधना ऐसी करिये,
तभी आपको हो सकता है, ईश्वर दर्शन l
जो सेवक हैं सही अर्थ में, वे तो समझें खुद को अफसर,
वेतन भोगी कहें भले ही, छोड़ें नहीं कोई भी अवसर l
जनहित के क्या काम करेंगे, सोच समझ जिनकी है लिप्सा,
समय नहीं जो दर्द सुन सकें, ऐसा ही होता है अक्सर |
कर भला, होगा भला, यह बात मुद्दत से पढ़ी,
अब बुराई में भलाई, ढूढ़ते सबसे बड़ी l
केवल भरोसा राम का, यह युक्ति ही बेकार है,
यदि सफलता चाहते तो,फिर करो मेहनत कड़ी l
रहा उपेक्षित वही वर्ग ही, जो नेत्रत्व दिया करता है,
अधिकारों के साथ साथ ही, जो कर्तव्य किया करता है l
आज समय ने करवट बदली, पीड़ा और बढ़ा दी मन की,
प्यास बुझाये जो औरों की, वह अपमान पिया करता है l
लज्जा,शील,सनेह, यही तो नारी के आभूषण,
निज का जो व्यक्तित्व, सदा से ही है दर्पण l
चन्चल और चपलता को उन्माद कहा है
सहज सरलता प्रेम रहा उसका आकर्षण l
सघन वृक्ष ही सदा उखड़ते, वेत सलामत सदा रही है,
सहज नम्रता और समर्पण, कारण बनता बात सही है l
पर्वत को भी चीर सकी है, सरिता अपनी राह बनाती,
अहंकार को तजो,सफलता मिलती है, यह बात कही है l
सृष्टि क्रम से जो जुड़ा, वह है पुरातन,
साध्य से कैसे जुड़े, हों नित्य साधन l
धर्म मत बाँटो, नया है या पुराना,
नित्य नूतन सत्य ही होता सनातन l
तभी आपको हो सकता है, उसका दर्शन l