Tuesday, 31 October 2017

प्रभु जी, हरते सबकी पीर,

प्रभु जी, हरते सबकी पीर,
सभी दुखी हैं, सभी व्यथित हैं,
          सब ही बड़े अधीर l
काम, क्रोध से जो बच पाते,
क्षमा, शान्ति को जो अपनाते,
          वे ही सन्त फकीर l
लोभ, मोह, माया का चक्कर,
इसीलिये तो भटके दर दर,
          भर नैनों में नीर l
कर्म करो, फल उस पर छोड़ो,
विषय वासना से मुँह मोड़ो,
          बदले तब तकदीर l
तुम जोड़ो सच से ही नाता,
जो मन से प्रभु के गुण गाता,
          माथे लगे अबीर l
कोन थाह पा सकता उसकी,
करता वह परवाह सभी की,
          सागर सा गम्भीर l
सबका दाता, सबका प्यारा,
सत्य सदा शिव,सबसे न्यारा,
           उसको सबकी पीर l
जिसने गाया, उसने पाया,
उसने भी सबको अपनाया,.
           तुलसी, सूर, कबीर l
उसका नाम जपेंगे हम सब,
फिर पीड़ा क्यों होगी जब तब,
          मन में रख तू धीर l
     प्रभु जी, हरते सबकी पीर l

- Dr. Harimohan Gupt

Saturday, 28 October 2017

रिश्ते में जो भी अपने थे, देखो, अब सब आम हो गये,

रिश्ते में जो भी अपने थे, देखो, अब सब आम हो गये,
कहाँ जानते लोग हकीकत, हमीं यहाँ बदनाम हो गये l
             मैने वह ही चादर ओढ़ी, जिसमें अपने पाँव समायें,
             चादर कर दी मैली मेरी, बोलो कैसे मन को भायें ?
कर्जदार हैं वे औरों के, लेकिन घर में दाम हो गये,
कहाँ जानते लोग हकीकत, हमीं यहाँ बदनाम हो गये l

               जब तक सुख सुविधायें बाँटीं, लोग जुड़े हम से ही आ कर,
               आज दिवाला निकल गया तो, वही पा रहे सुख अब जा कर l
 जो निर्धन थे, वे कुवेर हैं,श्रद्धा के वे धाम हो गये,
कहाँ जानते लोग हकीकत, हमीं यहाँ बदनाम हो गये l
                जिसने साथ दिया उसको ही, धक्का देकर आगे आये,
                हाँ में हाँ ही सदा मिला कर, उल्लू सीधा वे कर पाये l
चरण वन्दना के ही बल पर,अब तो वे श्रीराम हो गये,

कहाँ जानते लोग हकीकत, हमीं यहाँ बदनाम हो गये l 


- Dr. Harimohan Gupt

Friday, 27 October 2017

जग प्रकाशित है सदा आदित्य से

जग प्रकाशित है सदा आदित्य से,
हम प्रगति करते सदा सानिध्य से,
कोई माने, या न माने सत्य है,

देश जाग्रत है सदा साहित्य से l 
       हरिमोहन गुप्त