पुत्र पिता से
जाना जाता यही नियम है,
पिता पुत्र से
जाना जाये होता कम है l
पिता धन्य है
जिसका पुत्र सवाया होता,
दशरथ जाने गये
राम से यह अनुक्रम है l
बना कर देह का दीपक,
जलाओ स्नेह की बाती,
मिटे मन का अँधेरा भी,
प्रकाशित हो धरा सारी|
दिवाली रोज मन जाये,
बढ़े धन धान्य जीवन में,
प्रभुल्लित आप रह पायें,
यही शुभकामना मन की |
हमें सद बुद्धि
ऐसी दें,
करें उपकार जीवन
में,
बढ़ें हम सब प्रगति पथ पर,
यही है
चाह बस मन में |
निरोगी आप तन मन से,
करें निस्वार्थ सेवा
भी,
रहूँ स्मृति पटल पर मैं,
यही है प्रार्थना
सब से |
यही है प्रार्थना मेरी |
डा० हरिमोहन गुप्त