चढ्ना है
पहाड़ के ऊपर ,झुक कर चढ्ना होगा,
अगर
चाहते मन्जिल पाना, रुक कर चलना होगा |
अकड
दिखा कर जो भी चलता, ठोकर खा गिर जाता,
लक्ष्य प्राप्ति हित, हो प्रयास रत,गिर कर उठना होगा |
सोच रहा क्या मन में ?
पिंजरा तो खाली करना है, रहता किस उलझन में,
प्राणी, सोच रहा क्या मन में |
विखर जांयगे फूल सभी जो, महक
रहे उपवन में,
पंछी
कहता उड़ो यहाँ से, क्यों रहता
बन्धन में,
प्राणी, सोच रहा क्या मन में |
व्याकुल हो यह ही कहता है, क्या है मैले तन में,
अगले पल की खबर नहीं है, चला
जायगा क्षण में,
प्राणी, सोच रहा क्या मन में |
कौन देख पाया है कल को, व्याप्त वही कण कण में,
आस दूसरे की क्या करना, खुद
देखो दर्पण में,
प्राणी, सोच रहा क्या मन में |
जाने की बारी
जब आई, लिप्सा क्यों
है धन में,
अब भी समय सोच ले प्राणी, रहना नहीं चमन में,
प्राणी, सोच रहा क्या मन में |